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बंधुआ मजदूर

Posted On 8 Apr, 2017 में

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नैतिक दृष्टिकोण से हमारे आधुनिक समाज पर बंधुआ मजदूरी एक बदनुमा दाग है। इसके तहत नियोक्ता अपना स्वार्थ सिद्धि मजदूरों के दायनीय स्थिति को ताक पर रख कर करता है। नियोक्ता का पूरा जोर होता है कि न्यूनतम व्यय कर मजदूरों से अधिकतम कार्य लिया जाए।
कहने को तो नेता हमारे समाज से बंधुआ मजदूरी का उन्मूलन कर चुके हैं। किन्तु, दुर्भाग्य की बात यह है कि यह प्रथा हमारे आधुनिक नेता के देख-रेख में खूब फल-फूल रहा है।
विभिन्न संवर्ग में न्यूनतम मजदूरी पर मजदूरों को बहाल करना नेताओं का फितरत हो गया है। हमारे नेता हमेशा प्रयत्नशील रहते हैं कि आम लोगों/कर्मियों को न्यूनतम मजदूरी दिया जाए एवं स्वयं के लिए अधिकतम मजदूरी एवं भत्ता का सृजन किया जाए।
पिछले कुछ वर्षों में नियोजित कर्मियों की बहाली इसका प्रमुख उदाहरण है। तैय मानक से किसी को कम मजदूरी देना बंधुआ मजदूरी की निशानी है। यही वजह है की समय-समय पर यह असमानता इन नियोजित मजदूरों में असंतोष की भावना को जन्म देता है। इसी असंतोष के कारण ही नियोजित कर्मी हड़ताल करने पर विवश होते हैं।
वर्तमान समय में जहाँ नेतागण बड़े-बड़े चौपाल में बैठकर अपना लाखों-करोड़ों बारे-न्यारे करते हैं; वहीं नियोजित कर्मियों को वाजिब हक देने में ना-नुकूर करते हैं। तैय मानक से कम मजदूरी देना उनके क्रूरता का परिचायक है। ऐसे क्रूर और अत्याचारी नेताओं को धिक्कार है। स्वयं बड़े-बड़े चौपाल में बैठकर अपने लिए ज्यादा-से-ज्यादा पेंशन और भत्ता तैय करते हैं। वहीं शिक्षा जैसे मौलिक और महत्वपूर्ण क्षेत्र को सुचारु तरीके से चलाने के लिए तैय मजदूरी से कम पर नियोजित कर्मियों को बहाल करते हैं।
दुर्भाग्य है कि सर्वोच्च न्यायालय के फैसले “समान कार्य के लिए समान वेतन” की खुलेआम अवहेलना कर कानून की धज्जी उड़ाने के बावजूद उन्हें दंडित करने वाला कोई नहीं है।
काश! कोई इनको भी कानून का सम्मान करना सीखा पाता।
काश! कोई इनको भी समझा पाता कि समान कार्य के लिए असमान वेतन अन्यायपूर्ण है।
काश! कोई इनको एहसास दिला पाता कि बड़े-बड़े चौपाल में बैठकर स्वयं के लिए अधिकतम वेतन लेना और दूसरों को चवन्नी देना गलत बात है।
काश! कोई आम लोगों को भी उनके लिए कानून बनाने का अधिकार देता तब हम भी उनके पेंशन, भत्ता, मजदूरी आदि पर कैँची चलाते।



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